सुबह सुबह ट्रैन में आये कुछ विचार
कल रात में ठीक से नींद नहीं आयी | सुबह जल्दी ट्रैन से आना था और रात में लेट सोये थे | सुबह हड़बड़ाहट में पानी का बोतल गिर गया, फिर फ़ोन पानी में भीग गया और रेलवे स्टेशन पर थोड़ा जल्दी जल्दी चलना पड़ा |
ट्रैन में बैठ कर थोड़ी देर में जब सांस नार्मल हुआ तो थोड़े ख्याल आये | सोचा थोड़ा लिख लूँ | मन हल्का हो जाता ह लिखने से |
जब सब सामान पापा दिलाते थे मेरा, तो मैं कोई भी जूता बिना सोचे खरीद लेती थी अब 8०० रूपए के जूते पर भी ऑफ होने का इंतज़ार करती हूँ |
बचपन में वो दो चम्मच हक़ में आया गाजर का हलवा बहुत ज्यादा अच्छा लगता था | उसकि खुशबू और स्वाद आज भी दिमाग में एक दम ज़िंदा ह | पर अब वो दो कटोरी हलवा खा सकती हूँ लेकिन इतना मज़ा नहीं आता |
अम्मा (दादी) को बचपन से दूकान पर बैठा देख कर लगा की वो अमर ह | कभी लगा नहीं की वो चल बसेंगी | फिर जब तीन स साल पहले वो चल बसी तो लगा की शायद सबको जाना ह | अपना तो डर नहीं ह लेकिन अपने मा-बाप, सगे-समबधियो, दोस्तों को खोने का डर लगता ह | फिर चिंता में मैं उन्ही से लड़ जाती हूँ, झटक कर बात करने लगती हूँ | कितनी अजीब सी होती ह ज़िन्दगी |

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